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डाक्टर राथर ने जब दूसरे कमरे में जा कर मुज़्तरिब हालत में ‘ज़मींदार’ का ताज़ा पर्चा खोला तो उस को एक ख़बर की सुर्ख़ी नज़र आई, “डाक्टर राथर पर रहमत ख़ुदावंदी के फूल।” उसके नीचे ये दर्ज था कि पुलिस ने उसको धोका दही के सिलसिले में गिरफ़्तार करलिया है।

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नसीमा ने एक लंबी, ‘नहीं’ कही, “आप…खाना खा चुके हैं…मैंने आपको दिया था।” “नहीं नहीं… आप ज़रूर पियेंगे…सर का दर्द कैसे दूर होगा?” डाक्टर राथर ने सारा ढोंग कुछ ऐसे ख़ुलूस से रचाया था कि उसको महसूस ही न हुआ कि उसने दवा के बजाय शराब पी है, लेकिन जब हल्का सा दर्द उसके दिमाग़ में नुमूदार हुआ तो वो दिल ही दिल में ख़ूब हँसा। तरकीब ख़ूब थी। उसकी बीवी ने ऐ’न पंद्रह मिनट के बाद दूसरी ख़ुराक गिलास में उंडेली। उसमें सोडा डाला और डाक्टर राथर के पास ले आई, “ये लीजिए, दूसरी ख़ुराक…कोई ऐसी बुरी बू तो नहीं है।”

उन दिनों शराब बहुत सस्ती थी। आठ रुपये की एक बोतल। अद्धा चार रुपये आठ आने में मिलता था। मगर हर रोज़ एक अद्धा लेना, ये डाक्टर राथर की बिसात से बाहर था। उसने सोचा कि घर में पिया करे। मगर ये कैसे मुम्किन था। उसकी बीवी फ़ौरन तलाक़ ले लेती। उसको मालूम ही था कि उसका ख़ाविंद शराब का आदी है। इसके अलावा उसको शराबियों से सख़्त नफ़रत थी, नफ़रत ही नहीं, उनसे बहुत ख़ौफ़ आता था। किसी की सुर्ख़ आँखें देखती तो डर जाती, “हाय, डाक्टर साहब, कितनी डरावनी आँखें थीं उस आदमी की… ऐसा लगता था कि शराबी है।” डाक्टर राथर में बेशुमार ख़ूबियां थीं। एक ख़ूबी ये भी थी कि सादा लौह था लेकिन सब से बड़ी बुराई उसमें ये थी कि पीता था और अकेला पीता था। शुरू शुरू में तो उसने बहुत कोशिश की कि अपने साथ किसी और को न मिलाए लेकिन यार दोस्तों ने उसको तंग करना शुरू कर दिया। उनको उसका ठिकाना मालूम होगया। ‘सेवाए बार’ में शाम को सात बजे पहुंच जाते, मजबूरन डाक्टर राथर को उन्हें अपने साथ पिलाना पड़ती। ये लोग उसका गुन गाते, उसके मुस्तक़बिल के मुतअ’ल्लिक़ भी हौसला-अफ़्ज़ा बातें करते। राथर नशे की तरंग में बहुत ख़ुश होता और अपनी जेब ख़ाली कर देता। नसीमा खिखिला कर हंसी, “चूहे… आप ये चूहे क्यों नहीं खाते?” “ला’नत है ऐसी दवाओं पर!” गो डाक्टर राथर तीन मर्तबा एम.बी.बी.एस के इम्तहान में फ़ेल हो चुका था, मगर उसके बाप को यक़ीन था कि वो अंजामकार बहुत बड़ा डाक्टर बनेगा और डाक्टर राथर अपने बाप का इस क़दर फ़र्मांबरदार था कि उसको भी यक़ीन था कि एक रोज़ वो लंडन के हार्ले स्ट्रीट में बैठा होगा और उसकी सारी दुनिया में धूम मची होगी। Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

You have remaining out of 5 free poetry pages per month. Log In or Register to become Rekhta Family member to access the full website. डाक्टर राथरने बड़े ता’ज्जुब से पूछा, “क्या होगया है तुम्हें?” “हाँ हाँ, ज़रूर जाईए… मेरे मुतअ’ल्लिक़ भी उनसे बात कीजिएगा।”

Online Treasure of Sufi and Sant Poetry ये तरकीब तलाश कर लेने पर डाक्टर राथर बेहद ख़ुश हुआ। अपनी ज़िंदगी में पहली बार उसने यूं महसूस किया जैसे उसने एक नया अमरीका दरयाफ़्त कर लिया है, चुनांचे सुबह-सवेरे उठ कर उसने अपनी बीवी से कहा, “नसीमा, आज मेरे सर्द में बड़ा दर्द हो रहा है… ऐसा लगता है फट जाएगा।” दूसरी ख़ुराक ऐ’न पंद्रह मिनट के बाद उसकी बीवी तैयार करके ले आती। इसी तरह तीसरी ख़ुराक उसको बिन मांगे मिल जाती… डाक्टर राथर बेहद मुतमइन था। इतने दिन गुज़र जाने पर उसके और उस की बीवी के लिए ये दवा का सिलसिला एक मा’मूल हो गया था।

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